• डॉ. एम. डी. थॉमस


Well-reputed as a versatile thinker, speaker, writer, teacher, professor, composer, spiritual leader and social reformer, Dr M.D. Thomas is deeply oriented to inclusive thinking and harmonious living. Ordained as a catholic guru (committed to the service of the society on a life time basis) in 1979, his frame of mind is truly universal and is in complete tune with the word ‘catholic’.

The areas of his life-mission include fostering unity among Christian traditions, promoting interaction, fellowship and harmony among diverse faith-based affiliations, fostering inter-community relations and advancing universal values, peace processes, social harmony and human wellbeing.

Born in 1953, at Moolamattam, Idikki, Kerala, and specialized in Hindi, the national language, literature and culture, to Bachelor's (B.A.) and Master's (M.A.) levels, from Vikram University, Ujjain, and to Doctor’s (Ph.D.) level, from Banaras Hindu University, Varanasi, the horizons of his knowledge, experience and expertise have been regularly broadening towards national and global proportions, along with his journey of life as well as research, exposure and active engagement with the society.

He holds also Bachelor of Theology (B.Th.) in Christianity and Comparative Philosophy of Religions from Urban University, Rome, and Pradhama, Madhyama and Bachelor of Music (B.Mus.) from Indira Kala Sangeet Vishwa Vidyaalay, Khairagarh, Chhatisgarh.

Through his research on 'the social implications of the understanding of God in Kabeer and Christian Thought', Dr Thomas developed a comparative perspective in either tradition of thought. Remaining firmly grounded in the genius of either context, he highlighted the direct bearing of one's engagement with the divine and applied the same to the diverse areas of human life. Obviously, this is the brilliant outcome of his thesis. This has been a creditable contribution of its own right and, surely, it could go a long way in boosting up communal harmony, social cohesion and global welfare.

The book ‘Kabeer aur Eesaayee Chintan’ has been the fruit of his multi-disciplinary research between Kabeer and Christian Philosophy and the same won for him ‘Saahityik Kriti Sammaan--2003-2004’ from Hindi Academy, Delhi. He is the only person from the Christian and Kerala roots who holds the credit of being recognized by the above Academy for contribution to Hindi Literature.

Today, Dr Thomas is a strong advocate of national integration and social harmony as well as an analyst and commentator of diverse social concerns that guide the destinies of human life, especially in India. Sharpening the ethical fibre of social life, in view of making a more qualitative and harmonious society, is the preferred focus of his engagements.

His contribution by now includes guest lectures at nearly 100 universities and colleges, and at some 50 Christian institutes, over 30 resource lectures for school teachers, above 1500 lectures, speeches and views at multi-faith conferences, civil platforms and public gatherings and messages at places of worship of all faiths as well as nearly 50 occasions of delivering comments at TV channels and radio.

He has to his credit over 300 published articles, in English and Hindi, and an audio-CD of his musical compositions, called 'Samanvay-dhaara', too. His commitment to his versatile mission keeps taking him to new and larger platforms as well as social engagements, coupled with a progressive widening of his insights in the area in hand.

18 literary, cultural, social and multi-faith organizations have recognized his contribution with Awards and Certificates of Honour. Membership of 22 organizations of diverse character and 28 visits to more than 22 countries so far deepened his conviction in cross-cultural interaction and mutual enrichment as well as accorded him wide-ranging expertise. He has up to now held 18 positions of responsibility at local, regional and national levels, as well.

He is an established scholar of Hindi, Kabeer, saint poets, linguistics, education, culture, Christianity, religions, harmony of faiths, social ethics, national integration and social amity. Nowadays, he is a recognized professional of multi-faith insights, harmony of faiths, inter-community relations and social harmony, which he has been intensively engaged in for the last 25 to 30 years.

He is also invited to a few universities in the capacity of Visiting Professor, Research Guide, Ph.D. Examiner (assessing the thesis and conducting Viva Voce), Member of Board of Studies and Member of Academic Council, especially on themes related to religion, harmony of faiths and cross-cultural perspectives.

Being Founder Director of ‘Samanvay Institute of Religion and Culture’ in Ujjain, National Director of the Commission for Religious Harmony, CBCI, New Delhi, and Editor of half-yearly multi-faith journal ‘Fellowship’ deepened his experience and expanded his proficiency in the field, both at local, regional, national and international levels.

Presently, he is Founder Chair and Director of ‘Institute of Harmony and Peace Studies, New Delhi’, which is a multi-disciplinary and multi-community establishment for fostering cross-cultural perspectives through educational research for interfaith perspectives, inter-community relations, universal values, social harmony and societal transformation.

He is also pursuing the project of rendering universal values from sacred scriptures and traditions into poetry and music, publishing books, composing and releasing audio-CDs on harmony themes and addressing and organizing social gatherings of diverse compositions. ‘Inclusive thinking and harmonious living’ is the esteemed motto of his life.

परिचय (संक्षेप में) || परिचय (विस्तार में)

बहु-आयामी विचारक, वक्ता, लेखक, प्रवक्ता, प्रोफ़ेसर, संगीत-रचयिता, धर्म-गुरु और समाज-सुधारक के रूप में जाने-माने डाॅ. एम. डी. थाॅमस सर्व-समावेशी सोच और सामाजिक तालमेल की ओर प्रतिबद्ध हैं। 1979 में कैथॅलिक गुरु (समाज की सेवा में आजीवन समर्पित​) के रूप में दीक्षित होकर वे ‘सार्वभौमता’ का भाव लेकर जीवन जीने के प्रति समर्पित हैं।

विविध ईसाई परंपराओं में एकता बढ़ाना, सभी धार्मिक समुदायों में आपसी समझ और मैत्री कायम करना, सार्वभौम मूल्यों और मानव-कल्याण की भावना का प्रसार करते हुए शांति प्रक्रियाओं में लगे रहना आपके जीवन का विशिष्ट मिशन है।

केरल प्रांत के जिला इडिक्की और गाँव मूलमट्टम् में 1953 में जन्मे और मलयालम मूल के डाॅ. थाॅमस ने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन, से हिन्दी साहित्य (अंग्रेजी साहित्य और समाज शास्त्र भी) में बी.ए. और एम.ए. तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, से पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं।

आपने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़, से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रथमा, मध्यमा और बी. म्यूज. (7 साल) तथा अर्बन विश्वविद्यालय, रोम, इटली, से ईसाई दर्शन और तुलनात्मक धर्म-दर्शन में बी.टीएच. की उपाधियाँ भी हासिल की हैं।

आपने ‘कबीर और ईसाई दर्शन में ईश्वर-परिकल्पना का सामाजिक आशय’ नामक अपने शोध-विषय के दोनों पहलुओं में तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य को विकसित करने की विशिष्ट पहल की है। आपका विश्लेषण है कि ईश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाएँ दोनों ही परंपराओं के सामाजिक जीवन को परिलक्षित करती हैं।

साथ ही, प्रस्तुत शोध-प्रबंध के जरिये आपने हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई परंपराओं के तुलनात्मक विचार से उनमें आधारभूत तौर पर मौजूद वैचारिक, धार्मिक और सांस्कृतिक​ एकता को एक सार्वभौम मापदण्ड के रूप में प्रस्तुत भी की है। यह रचना अपनी किस्म की पहली रचना है जो देश की एकता तथा अखंडता के साथ-साथ सांप्रदायिक समरसता और सौहार्द को विभिन्न आयामों में प्रोत्साहित करती है।

हिन्दी अकादमी, दिल्ली, ने उपर्युक्त पुस्तक के लिए डाॅ. थाॅमस को ‘साहित्यिक कृति सम्मान 2003-2004’ से सम्मानित किया है। आप गैर-हिन्दी मूल से, खास-तौर से केरल और ईसाई मूल से, हिन्दी साहित्य के लिए योगदान हेतु सम्मानित किए जाने वाले पहले व्यक्ति हैं।

डाॅ. थाॅमस ने अब तक करीब 100 विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों, कुछ 50 ईसाई संस्थानों तथा हजारों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सर्व धर्म और सामाजिक मंचों पर पिछले कुछ पच्चीस वर्षों से विविध विषयों पर व्याख्यान दिये आ रहे हैं। पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में हिन्दी और अंग्रेजी में अब तक आपके 300 से अधिक लेख प्रकाशित भी हो चुके हैं।

समाज में आपसी सदभाव, मैत्री, सहयोग, तालमेल तथा शांति बढ़ाने के विशिष्ट प्रयासों के लिए आप 18 प्रतिष्ठित साहित्यिक, सांस्कृतिक​, सामाजिक और सर्व धर्म संस्थानों द्वारा अभिनंदित भी किये गये हैं। आप कुछ 20 साहित्यिक, कलात्मक, सांस्कृतिक​, सामाजिक, धार्मिक और सर्व धर्म संगठनों के सदस्य हैं। आपने कुछ 21 भारतेतर देशों की 28 शैक्षिक-सांस्कृतिक​ यात्राएँ भी की हैं। अब तक आपने विविध जगहों पर 18 पद भी सँभाले हुए हैं।

आपके द्वारा स्वरबद्ध सार्वभौम आध्यात्मिक मूल्यों पर बने गीतों का एक आॅडियो-सीडी एलबम ‘समन्वय धारा’ लोकर्पित हो चुका है। सामाजिक और आध्यात्मिक समन्वय की भावना पर बनी हिन्दी के संत-कवियों की पंक्तियों पर आपके द्वारा स्वरबद्ध गीतों का दूसरा एलबम ‘समन्वय सरिता’ शीघ्र ही लोकार्पित हो रहा है।

भाषा, साहित्य, कला, संगीत, दर्शन, धर्म और संस्कृति में विशेष रुचि एवं हिन्दी साहित्य, संत काव्य, कबीर, सर्व धर्म समन्वय, हिन्दुस्तानी संगीत, अध्यात्म, सार्वभौम मूल्य, सामाजिक नैतिकता, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक तालमेल, आदि विषयों में प्रावीण्य रखने वाले डाॅ. थाॅमस सांस्कृतिक​ समन्वय, सामाजिक सहयोग व राष्ट्र-निर्माण के प्रति विशेष समर्पित हैं। आप मानव अधिकार के साथ-साथ मानव कर्तव्य की वकालत में भी सक्रिय हैं।

आप कुछ विश्वविद्यालयों में धर्म​, तुलनात्मक धर्म​, सर्व धर्म समन्वय, सामाजिक समरसता, आदि बहुआयामी विषयों पर अतिथि प्रोफेसर​, अकादमिक काउण्सिल और बोर्ड आॅफ स्टडीज़​ के सदस्य, शोध मार्ग​-दर्शक, शोध परीक्षक (शोध​-प्रबंध के मूल्यांकन और मौखिकी) के रूप में मनोनीत और कार्यरत भी हैं।

डाॅ. थाॅमस 1995 से 2000 तक साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ाने के लिए स्थापित ‘समन्वय धर्म और संस्कृति संस्थान, उज्जैन,’ के संस्थापक निदेशक रह चुके हैं। आप भारत के कैथॅलिक ईसाई समुदाय द्वारा संचालित ‘सर्व धर्म समन्वय आयोग, सी.बी.सी.आई., नयी दिल्ली,’ के राष्ट्रीय निदेशक के रूप में 2003 से 2011 तक नौ वर्षों के लिए कार्यरत रहे हैं। आप वैचारिक आदान-प्रदान, सर्व धर्म सोच व साझी संस्कृति की मानसिकता को बढ़ाने के लिये चलायी जा रही अर्ध-वार्षिक पत्रिका ‘फ़ेलोशिप’ के सम्पादक भी रहे हैं।

वर्तमान में डाॅ. थाॅमस ‘इंस्टिट्यूट आॅफ़ हारमनि एण्ड पीस स्टडीज़’, नयी दिल्ली, के संस्थापक निदेशक हैं। आप की कुछ अन्य प्रक्रियाधीन योजनाएँ हैं - सामाजिक तालमेल पर भारत के सन्त-कवियों के दर्शन पर लेखन, विविध धर्म-ग्रंथों और परंपराओं में निहित सार्वभौम मूल्यों पर गीत व संगीत-रचना तथा समन्वयवादी दर्शन से जुड़े मुद्दों पर हिन्दी और अंग्रेज़ी में पुस्तकें और लेख। समन्वय दर्शन आपकी जीवन-दृष्टि है। समन्वयमूलक समाज का सृजन आपका विशिष्ट मिशन है।